महराजगंज: जिला अस्पताल कार्रवाई जारी, फिर भी दलालों की घुसपैठ पर नहीं लग सकी लगाम

जिला अस्पताल: कार्रवाई जारी, फिर भी दलालों की घुसपैठ पर नहीं लग सकी लगाम :

महराजगंज ; जिला अस्पताल में दलालों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है, समय-समय पर इनकी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई होती रही है, लेकिन उनकी सक्रियता पर अब तक प्रभावी रोक नहीं लग सकी है।

कभी मरीजों को निजी अस्पतालों में भेजने की शिकायत सामने आती है, तो कभी निजी पैथोलॉजी लैब में जांच कराने को लेकर विवाद होता है, हालिया प्रशासनिक कार्रवाई से दलालों में भय जरूर देखने को मिला, लेकिन उनकी जड़ें अब भी बनी हुई हैं।

मंगलवार को अस्पताल में माहौल कुछ बदला नजर आया, डॉक्टरों के कक्षों में दलालों की अनुपस्थिति दिखी, मरीज ही पर्चा लेकर सीधे दवा वितरण काउंटर तक पहुंचे, कोई बाहरी व्यक्ति उनकी पर्ची लेकर घूमता नहीं दिखा।

सीसीटीवी से सीधी निगरानी :
अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. ए.के. द्विवेदी खुद सीसीटीवी के माध्यम से सभी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थे, दोपहर में जब कतार में खड़े मरीजों को असुविधा हुई, तो उन्होंने तुरंत एक कर्मचारी को भेजकर व्यवस्था दुरुस्त कराई, अस्पताल के सभी अनुभागों में लगभग चार घंटे तक उन्होंने निरीक्षण किया और सुधार की दिशा में कदम उठाए।

मरीजों को मिली थोड़ी राहत :
सर्जिकल वार्ड में भर्ती ज्ञांति देवी ने बताया कि उनके बेटे का इलाज नियमित हो रहा है और डॉक्टर समय पर आते हैं, अस्पताल के आस-पास की दवा दुकानों पर भी बाहरी युवकों की आवाजाही नहीं दिखी, यह बदलाव प्रशासनिक दबाव का असर माना जा रहा है।

पुराने मामले भी हैं चिंताजनक :
20 जनवरी 2025 की एक घटना भी अब तक लोगों की याद में ताजा है, जब महुअवा महुई निवासी विजय नामक युवक दलालों के जाल में फंस गया था, सरकारी अस्पताल से इलाज शुरू करवा कर उसे निजी अस्पताल भेजा गया, जहाँ 14,000 रुपये का बिल थमा दिया गया, विजय ने तब ट्रॉमा सेंटर पर हंगामा भी किया था, पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

दलालों का नेटवर्क अब भी सक्रिय :
सूत्रों की मानें तो एंबुलेंस चालकों से सेटिंग कर दलाल मरीजों की जानकारी इकट्ठा करते हैं, शहर के कई निजी अस्पताल इन्हीं नेटवर्क के जरिए मरीज भर्ती कराते हैं, डिस्चार्ज के बाद दलालों को उनका कमीशन दे दिया जाता है, हर दलाल का एक विशिष्ट काम तय है—कोई दवा के नाम पर ठगता है, कोई खून की जांच के नाम पर, तो कोई एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड के बहाने मरीजों को निजी केंद्रों पर भेज देता है।

ईमानदार दलाली का सिस्टम :
दलालों का यह नेटवर्क इतना संगठित है कि कमीशन तक तय समय पर केस और पर्चे के अनुसार पहुंचा दिया जाता है, किसे क्या काम करना है और कितना हिस्सा मिलेगा, यह सब पहले से तय रहता है।

प्रशासन की कार्रवाइयों के बावजूद दलाली की जड़ें अभी भी मजबूत हैं, कुछ समय के लिए हलचल भले कम हो जाए, लेकिन जब तक पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आएगी और कठोर निगरानी नहीं होगी, तब तक दलालों की सक्रियता पर पूरी तरह रोक लगाना कठिन रहेगा।

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