नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह ने संवैधानिक मूल्यों और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा करते हुए एक महत्वपूर्ण बयान दिया है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय संविधान ने भारत को कभी भी ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित नहीं किया है, बल्कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो सभी धर्मों को समान रूप से स्वीकार करते हैं।
विविधता ही भारत की शक्ति:
भोपाल में ‘NLIU-SBA लॉ कॉन्क्लेव 2026’ को संबोधित करते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि भारत की पहचान उसकी बहुधार्मिक और समावेशी प्रकृति से है।
उन्होंने कहा:
> भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो कई धर्मों को मानते हैं। हमारे संविधान ने कभी भी यह घोषित नहीं किया कि हम एक हिंदू राष्ट्र हैं।
> उन्होंने आगे तर्क दिया कि जहाँ दुनिया के कई देशों के संविधान किसी एक विशिष्ट धर्म के प्रति समर्पित होते हैं, वहीं भारत का संविधान सभी समुदायों और विश्वासों को फलने-फूलने का अवसर देता है।
‘हिंदू’ शब्द की भौगोलिक व्याख्या:
जस्टिस सिंह ने अपने संबोधन में ‘हिंदू’ शब्द के ऐतिहासिक और भौगोलिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि:
* मूल रूप से ‘हिंदू’ शब्द का अर्थ किसी संप्रदाय से नहीं बल्कि एक भौगोलिक पहचान से था।
* सिंधु नदी (Indus) के पार रहने वाले लोगों को यूनानियों (Greeks) और अन्य बाहरी लोगों द्वारा ‘हिंदू’ कहा गया।
* समय के साथ यह शब्द एक धार्मिक पहचान के रूप में विकसित हुआ, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह इस भूमि के निवासियों की पहचान थी।
पश्चिमी प्रभाव और भारतीय दर्शन:
कॉन्क्लेव के विषय ‘बियॉन्ड कोलोनियल हैंगओवर्स’ पर चर्चा करते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि जब यूरोप अंधकार युग (Dark Ages) में था, तब भारतीय सभ्यता और यहाँ की कानूनी व दार्शनिक सोच (जैसे मीमांसा दर्शन) अत्यंत विकसित थी। उन्होंने जोर दिया कि भारतीय कानूनी प्रणाली को समझने के लिए हमें अपनी जड़ों और प्राचीन ज्ञान को भी महत्व देना चाहिए।
पृष्ठभूमि:
जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह, जो मणिपुर से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनने वाले पहले व्यक्ति हैं, अपने निष्पक्ष और संवैधानिक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक पहचान को लेकर अक्सर सार्वजनिक बहसें होती रहती हैं।





