हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-पसंद-नापसंद पर पुलिस नहीं खोल सकती हिस्ट्रीशीट:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस को किसी व्यक्ति की पसंद या नापसंद के आधार पर हिस्ट्रीशीट खोलने का निरंकुश अधिकार प्राप्त नहीं है, कोर्ट ने कहा कि यह नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता पर हमला है और पुलिस के पास ऐसी “अनियंत्रित” व “अनैतिक” शक्ति नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि हिस्ट्रीशीट तभी खोली जा सकती है जब ठोस और विश्वसनीय सबूत मौजूद हों, केवल संदेह या व्यक्तिगत कारणों से इसे खोला जाना कानून और न्याय दोनों के खिलाफ है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमावली के नियम 228 और 240 पुलिस को इस तरह का अधिकार नहीं देते कि वे मनमाने ढंग से किसी नागरिक का नाम निगरानी रजिस्टर में दर्ज कर सकें।

इस फैसले में जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस संतोष राय की खंडपीठ ने सिद्धार्थनगर एसपी के 23 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मोहम्मद वजीर की हिस्ट्रीशीट बंद करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

केस का बैकग्राउंड :
* याची मोहम्मद वजीर के खिलाफ सिर्फ एक मामला (2016 का गोहत्या अधिनियम) दर्ज था।
* इसके अलावा उनके खिलाफ कोई अन्य FIR, NCR या शिकायत नहीं थी।
* फिर भी पुलिस ने उनके खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोल दी और अर्जी खारिज कर दी।

पीड़ित ने हाईकोर्ट में दलील दी कि यह कदम पुलिस नियमावली के पैरा 228, 229, 231, 233 आदि का उल्लंघन है, क्योंकि केवल एक पुरानी घटना को आधार बनाकर हिस्ट्रीशीट नहीं खोली जा सकती।

कोर्ट का अवलोकन :
हिस्ट्रीशीट सामान्यतः उन्हीं व्यक्तियों की खोली जाती है जिनका पिछला आपराधिक रिकॉर्ड हो, जो आदतन अपराधी हों या पूर्व में दोषी ठहराए गए हों।
* आठ साल पुराना गोहत्या अधिनियम का एकलौता केस किसी को आदतन अपराधी नहीं बनाता।**
* सुप्रीम कोर्ट के गोविंद बनाम म.प्र. राज्य (1975) और मलक सिंह बनाम पंजाब-हरियाणा राज्य (1980) जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि पुलिस विनियमों का दुरुपयोग मनमानी निगरानी के लिए नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष :
* पुलिस अधीक्षक ने याची का आवेदन “लापरवाही से और बिना आधार” खारिज किया।
* पुलिस के पास यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री नहीं थी कि याची अपराध की प्रकृति में शामिल है।
* हिस्ट्रीशीट खोलने का कोई औचित्य नहीं था।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने हिस्ट्रीशीट खोलने का आदेश रद्द कर दिया और याचिका को मंजूरी दे दी।

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