जब कलम उठी, तब धमकियाँ मिलीं, क्या भारत में पत्रकार सुरक्षित हैं?

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे Reporters Without Borders (RSF) और Committee to Protect Journalists (CPJ) की रिपोर्टों में भारत को बार-बार ‘खतरनाक देश’ की श्रेणी में रखा गया है।

2024 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत का स्थान 159वां (180 देशों में) रहा, यानी प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा दोनों ही कमजोर स्थिति में हैं।

पांच पत्रकारों की मौत और भारत में पत्रकारों की सुरक्षा पर उठते सवाल :

मुकेश चंद्राकर (फ्रीलांस जर्नलिस्ट)

राघवेंद्र बाजपेयी (गोली मारकर हत्या)

धर्मेन्द्र सिंह चौहान (सिर में गोली मारकर हत्या)

राजीव प्रताप (एक डैम में मिलीं लाश)

सीएच नरेश कुमार (डिजिटल पोर्टल पत्रकार)

भारत में पत्रकार कई स्तरों पर असुरक्षित महसूस करते हैं:
राजनीतिक दबाव: सरकार या सत्ता पक्ष की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर मुकदमे या देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं।
सेंसरशिप और धमकियाँ: डिजिटल और सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ या विरोधी राय देने पर ट्रोलिंग, धमकी और ऑनलाइन हमले बढ़े हैं।
ग्राउंड रिपोर्टिंग का खतरा: विशेषकर कश्मीर, नक्सल प्रभावित इलाकों, या भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग में पत्रकारों को शारीरिक हमले या हत्या तक का सामना करना पड़ता है।
पुलिस या प्रशासनिक दमन: कई बार रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस द्वारा पत्रकारों को हिरासत में लेना, उपकरण छीन लेना या कवरेज से रोकना आम बात हो गई है।

हाल के उदाहरण :
* कुछ पत्रकारों की हत्या या संदिग्ध मौतें हुईं, जिनकी जांच अधूरी रही।
* कई राज्य सरकारों में पत्रकारों पर आईटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज किए गए हैं।
* महिला पत्रकारों को अक्सर ऑनलाइन उत्पीड़न और धमकियों का सामना करना पड़ता है।

कारण :
* कानून में पत्रकार सुरक्षा अधिनियम (Journalist Protection Law) की अनुपस्थिति।
* सत्ता और मीडिया का बढ़ता गठजोड़।
* स्वतंत्र पत्रकारिता की आर्थिक अस्थिरता।
* डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर अभिव्यक्ति की सीमाएँ।

कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ ने पत्रकार सुरक्षा कानून तैयार किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक कोई एकीकृत “Journalist Protection Act” लागू नहीं हुआ है।

> भारत में पत्रकारिता करना आज भी एक साहसिक काम है।
> पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं, लेकिन जब यह स्तंभ डर और दबाव में आ जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।
> इसलिए, भारत में पत्रकारों की सुरक्षा मजबूत कानून, स्वतंत्र जांच और सामाजिक सम्मान से ही सुनिश्चित हो सकती है।

Press Council of India (पीसीआई) ने कहा है कि पिछले दशक-दो में भारत में पत्रकारों की हत्या के मामलों में अदालतों में मुकदमे लंबित हैं — उदाहरण के लिए एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 80 पत्रकार पिछले 20 साल में मारे गए हैं और अधिकांश मामलों की सुनवाई अभी तक नहीं हुई।

भारत में केंद्र सरकार ने यह स्वीकार किया है कि National Crime Records Bureau (NCRB) या अन्य सरकारी स्रोतों के पास “पत्रकारों के खिलाफ हमलों/हत्या” का विशिष्ट विस्तृत डेटा प्रकाशित नहीं है — यानी कितने पत्रकार मारे गए, कितने गिरफ्तार हुए, राज्य-वार क्या स्थिति है — यह ठोस राष्ट्रीय रूप से उपलब्ध नहीं है।

विभिन्न स्रोतों की परिभाषाएँ और मापदंड अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, “सुरक्षित” का क्या अर्थ है (शारीरिक हमला नहीं होना, गिरफ्तारी नहीं होना, डर-डर के माहौल में काम करना न पड़ना, डिजिटल उत्पीड़न न होना आदि) — इन सबको अलग-अलग देखा जाता है। एक अध्ययन ने पत्रकार सुरक्षा को चार आयामों (शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, डिजिटल, आर्थिक) में मापा है।


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