
1942 : जब बलिया बना आज़ाद 🚩
बलिया। भारत छोड़ो आंदोलन की ज्वाला जब पूरे देश में भड़क रही थी, तब उत्तर प्रदेश का बलिया जिला आज़ादी का गवाह बना।
महात्मा गांधी के आंदोलन की पुकार से पूरा जिला आंदोलित था—थाने जल रहे थे, सरकारी दफ्तर लूटे जा रहे थे, रेल पटरियाँ उखाड़ी जा रही थीं और हर तरफ़ “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे गूंज रहे थे।
अंग्रेजी हुकूमत ने जनाक्रोश को दबाने के लिए चित्तू पांडेय और पं. राम अनन्त पांडेय जैसे नेताओं को जेल में कैद कर लिया, लेकिन जनता का जोश और उबाल थमने का नाम नहीं ले रहा था।
19 अगस्त 1942 :
भीषण जनसैलाब शहर की ओर बढ़ा, हर सड़क पर गांव-गांव से उमड़ी भीड़ जेल की ओर कूच कर रही थी। खुफ़िया रिपोर्ट से घबराए डीएम और कप्तान ने हालात बिगड़ने से पहले ही सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दे दिया।
कलेक्टर ने खजाने की गड्डियों के नम्बर नोट कर उन्हें जलवा दिया, लेकिन भीड़ का जुनून और तेज़ हो गया।
क्रांति मैदान (टाउन हॉल) में ठसाठस भरी भीड़ को पं. राम अनन्त पांडेय, राधामोहन सिंह, राधागोविन्द सिंह और विश्वनाथ चौबे जैसे नेताओं ने संबोधित किया।
फिर बुलाए गए चित्तू पांडेय।
उन्होंने ठेठ भोजपुरी में गरजते हुए ऐलान किया—
“बलिया में अब अपना राज स्थापित हो गइल।”
और यहीं से इतिहास बना—
* बलिया ने खुद को आज़ाद जिला घोषित किया।
* चित्तू पांडेय पहले कलेक्टर बने।
* पं. राम अनन्त पांडेय डिप्टी कलेक्टर नियुक्त हुए।
* महानद मिश्र बलिया के एसपी बनाए गए।
उस दिन बलिया ने दिखा दिया कि अंग्रेजी हुकूमत की जंजीरें तोड़ने की ताक़त जनता के जोश और बलिदान में है।