राजनितिक आलेख: महराजगंज की फरेंदा विधानसभा सीट पर इस वक्त सिर्फ चुनाव की तैयारी नहीं चल रही, बल्कि टिकट को लेकर सियासी शतरंज भी तेज हो गई है। कौन मैदान में उतरेगा, किसे पार्टी का भरोसा मिलेगा और NDA के सहयोगी दलों में से किसकी दावेदारी सबसे भारी पड़ेगी, इन सवालों ने फरेंदा की सियासत को दिलचस्प बना दिया है।
उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले की फरेंदा विधानसभा सीट (315) पूर्वांचल की उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जहां चुनावी मुकाबला हमेशा बेहद कांटे का और दिलचस्प रहा है। इसकी एक झलक साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली, जब कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी ने भाजपा के बजरंग बहादुर सिंह को महज 1,246 वोटों के सूक्ष्म अंतर से शिकस्त दी।

विधायक वीरेन्द्र चौधरी vs पूर्व विधायक बजरंग बहादुर सिंह
अब आगामी चुनाव को देखते हुए (NDA) इस सीट को दोबारा अपनी झोली में डालने की तैयारी में है। लेकिन पेंच सिर्फ विपक्ष से मुकाबले का नहीं है। सबसे बड़ा सवाल टिकट का है। भाजपा के भीतर कई चेहरे अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं NDA के सहयोगी दल भी फरेंदा पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं।
BJP में टिकट की जंग:
पुराने चेहरे बनाम बदलाव की चाहत: भाजपा के भीतर इस समय सबसे दिलचस्प मुकाबला पुराने दिग्गजों और नए विकल्पों के बीच दिखाई दे रहा है। हर दावेदार अपने-अपने समीकरण के साथ मैदान में है।
बजरंग बहादुर सिंह:
अनुभव का सबसे बड़ा चेहरा: फरेंदा की सियासत में बजरंग बहादुर सिंह कोई नया नाम नहीं हैं। वह 2007, 2012 और 2017 में लगातार तीन बार इस सीट का विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 2022 में चुनाव हारने के बावजूद उन्हें 83,935 वोट मिले थे। यह आंकड़ा बताता है कि हार के बाद भी क्षेत्र में उनका व्यक्तिगत जनाधार मजबूत रहा।
भाजपा के भीतर एक बड़ा धड़ा उनके अनुभव को सबसे सुरक्षित दांव मानता है। हालांकि, लगातार चुनाव लड़ने के कारण पैदा हुई स्वाभाविक एंटी-इन्कंबेंसी यानी स्थानीय नाराजगी उनके लिए चुनौती बन सकती है।
चौधरी शिवेंद्र सिंह:
क्या बदलाव का चेहरा बनेंगे? पूर्व विधायक चौधरी शिवेंद्र सिंह का गुट भी लंबे समय से फरेंदा में सक्रिय है। स्थानीय संगठन से लेकर जमीनी स्तर तक उनकी सक्रियता उन्हें बजरंग बहादुर सिंह के एक मजबूत विकल्प के रूप में सामने ला रही है।

पूर्व विधायक चौधरी शिवेंद्र सिंह
पार्टी में बदलाव की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं का झुकाव शिवेंद्र सिंह की ओर देखा जा रहा है। ऐसे में अगर भाजपा इस बार नया चेहरा उतारने का फैसला करती है, तो उनकी दावेदारी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
ईशू चौरसिया:

ईशू चौरसिया
OBC समीकरण पर दांव: फरेंदा की टिकट दौड़ में ईशू चौरसिया का नाम भी चर्चा में है। उन्होंने 2022 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के बैनर तले चुनाव लड़कर 21,665 वोट हासिल किए थे। अब उनका झुकाव भाजपा खेमे की तरफ माना जा रहा है। वह पिछड़े वर्ग यानी OBC समीकरण को साधने के आधार पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं।
अरुण शुक्ला:
संगठन और युवा चेहरे का विकल्प: अरुण शुक्ला (पूर्व जिलाध्यक्ष महराजगंज) भी इस सियासी दौड़ में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। स्थानीय ब्राह्मण मतदाताओं और युवाओं को गोलबंद करने के उद्देश्य से संगठन से जुड़े ऐसे चेहरों की सक्रियता बढ़ी है।

अरुण शुक्ला (पूर्व जिलाध्यक्ष महराजगंज)
अगर भाजपा आलाकमान चेहरा बदलने की रणनीति अपनाता है, तो संगठन से जुड़े नए चेहरों को मौका मिलने की संभावनाएं भी चर्चा में हैं।
NDA के सहयोगी भी पीछे नहीं:
फरेंदा की कहानी सिर्फ भाजपा के भीतर की टिकट जंग तक सीमित नहीं है। NDA के सहयोगी दल भी इस सीट के सामाजिक ताने-बाने और जातीय समीकरणों को देखते हुए अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।
सुभासपा:
फरेंदा पर सबसे आक्रामक दावा: सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) यानी सुभासपा इस सीट को लेकर सबसे ज्यादा आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ओम प्रकाश राजभर की पार्टी ने अपने राष्ट्रीय सचिव जितेन्द्र सिंह को बाकायदा फरेंदा का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है।

इसके बाद से जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की कवायद भी तेज है। इस सक्रियता को सिर्फ संगठन विस्तार के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे गठबंधन में फरेंदा सीट की मांग के दबाव के तौर पर भी देखा जा रहा है।
निषाद पार्टी:
दावेदारी के साथ सामने आया नया चेहरा: फरेंदा और महराजगंज बेल्ट में निषाद और केवट मतदाताओं की निर्णायक संख्या को देखते हुए निषाद पार्टी भी इस सीट को अपने कोटे में लेने की कोशिश में है। डॉ. संजय निषाद की पार्टी की ओर से शीर्ष स्तर पर इस सीट को लेकर लॉबिंग की चर्चा है। इसी बीच डॉ. निशांत त्रिपाठी भी निषाद पार्टी से जुड़कर फरेंदा की सियासत में एक नए और अलग तरह के चेहरे के रूप में उभर रहे हैं।

डॉ. निशांत त्रिपाठी
वैज्ञानिक से राजनेता बनने तक का सफर: क्षेत्र के ही मूल निवासी डॉ. निशांत त्रिपाठी ने जनता की सेवा और क्षेत्र के विकास को अपना लक्ष्य बताते हुए करीब 20 साल की प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए वे फरेंदा से एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं। राजनीति में कदम रखने से पहले डॉ. निशांत त्रिपाठी इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत NIELIT गोरखपुर में ‘Scientist-D’ और संयुक्त निदेशक (Joint Director) के पद पर तैनात थे।
मूल रूप से फरेंदा क्षेत्र के विशुनपुर अदरौना गांव के रहने वाले डॉ. त्रिपाठी ने क्षेत्र की पिछड़ी व्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से इस उच्च पद से इस्तीफा दिया है। निषाद पार्टी के साथ जनसंपर्क, विकास का विजन, डॉ. निशांत त्रिपाठी निषाद पार्टी से जुड़कर लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क कर रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार निषाद के मार्गदर्शन में वे लगातार गांवों का दौरा कर रहे हैं।
मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपने प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे को भी सामने रखा है। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दों में फरेंदा को जिला बनाना शामिल है। उनका कहना है कि भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से फरेंदा को एक अलग जिला बनाया जाना उनकी प्राथमिकताओं में है।
इस तरह निषाद पार्टी की सीट पर दावेदारी के बीच डॉ. निशांत त्रिपाठी की सक्रियता ने फरेंदा के चुनावी समीकरण में एक और नाम जोड़ दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि गठबंधन में सीट के बंटवारे के समय निषाद पार्टी की दावेदारी कितनी मजबूत होती है और डॉ. निशांत त्रिपाठी की राजनीतिक सक्रियता उसे कितना नया आयाम देती है।
अपना दल (सोनीलाल):
कुर्मी और OBC समीकरण पर नजर: अपना दल (सोनीलाल) भी फरेंदा के सियासी समीकरणों को टटोल रहा है। अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाला यह दल कुर्मी और अन्य पिछड़ी जातियों की गोलबंदी के आधार पर इस सीट पर संभावित दावेदारों की तलाश कर रहा है। यानी NDA के भीतर ही फरेंदा को लेकर कई तरह के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण सामने आ रहे हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती!
फरेंदा की राजनीति में कुछ ऐसे नाम भी हैं, जिनका प्रभाव सीधे टिकट की दौड़ में नजर न आए, लेकिन चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता जरूर रखता है।
अमरमणि त्रिपाठी और गणेश शंकर पांडेय फैक्टर:

गणेश शंकर पांडेय एवं अमरमणि त्रिपाठी
फरेंदा की राजनीतिक बिसात पर अमरमणि त्रिपाठी (पूर्व मंत्री) के परिवार और गणेश शंकर पांडेय (पूर्व विधान परिषद सभापति) का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह धड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से चुनावी मैदान में सक्रिय होता है, चाहे सपा गठबंधन के जरिए या NDA के ही किसी घटक दल के माध्यम से तो पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव की स्थिति बन सकती है। और अगर ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर भाजपा की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि फरेंदा में टिकट का फैसला सिर्फ यह तय करने का मामला नहीं होगा कि कौन चुनाव लड़ेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि कौन सा चेहरा किस सामाजिक समीकरण को साध पाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल—किसके नाम पर लगेगी मुहर?
फरेंदा में इस वक्त तस्वीर कई परतों में खुल रही है। एक तरफ बजरंग बहादुर सिंह का अनुभव और पुराना जनाधार है, तो दूसरी तरफ चौधरी शिवेंद्र सिंह के रूप में बदलाव की दावेदारी। वहीं ईशू चौरसिया OBC समीकरण के साथ अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं और अरुण शुक्ला जैसे संगठन से जुड़े चेहरे भी संभावनाओं के बीच मौजूद हैं।
इसके साथ ही NDA के भीतर सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (सोनीलाल) की दावेदारी ने टिकट की तस्वीर को और पेचीदा बना दिया है। वहीं निषाद पार्टी से जुड़े डॉ. निशांत त्रिपाठी की सक्रियता ने इस दावेदारी को एक नए चेहरे के साथ और दिलचस्प बना दिया है। और पर्दे के पीछे अमरमणि त्रिपाठी परिवार और गणेश शंकर पांडेय फैक्टर की संभावित भूमिका इस पूरी सियासी कहानी को और दिलचस्प बना देती है।
अब देखना यही है कि फरेंदा की सियासी शतरंज में भाजपा अपने पुराने मोहरे पर भरोसा जताती है, बदलाव का दांव खेलती है या NDA के किसी सहयोगी दल के हाथ में यह सीट सौंपती है। फरेंदा में मुकाबला अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन टिकट की लड़ाई ने सियासी तापमान जरूर बढ़ा दिया है।
Written & Research by: Rk Tripathi (Journalist)

















































